Sunday, August 31, 2008

गहराइयाँ बढ़तीं हैं साहिलों के बाद,
नजदीकियां बढ़तीं हैं फासलों के बाद,
उसूल-ऐ-रिश्ता राह है,
मंजिल मिलती है दिलों के बाद
लोक्साद

Friday, April 11, 2008

एक अकेला पंछी, दरख्त ने सहारा दिंया,
अपनी आंखों से जन्नत का नज़ारा दिया,
ऊम्र गुज़ारी दरख्त मे रहते,
उसको अपना आशियाँ कहते,
एक अकेला दरख्त, पंछी ने गुज़ारा दिया........
रंग दे बसन्ती श्वेत वस्त्र,
तज दे भक्ति की माला,
कर ले आसक्ति जग मे,
भर ले प्रेम का प्याला,
बांहों मे उत्साह भर ले,
सीने मे अरमान की ज्वाला,
आंखों मे दुनिया समों ले,
पीकर सारी मधुशाला...

Monday, March 31, 2008

शायद.....

दुनिया की इस भीड़ मे हम क्या दूंदते हैं?
शायद उसे जो इस भीड़ मे नही

अनजानी राहों मे भटकते हम क्या दूंढते हैं ?
शायद कोई भटका हुआ मुसाफिर जो मंजिल तक ले जाए

अनेक किस्से कहानियों मे हम क्या दूंढते हैं?
शायद कोई किरदार हमसे भी ज्यादा असली,

अनगिनत सपनों मे हम क्या दूंढते हैं?
शायद उसे जो न सच हो न सपना बस हो सिर्फ़ अपना

लोक्साद

Wednesday, March 26, 2008

सच

जीवन मे रस है
या रस मे जीवन है,
अधूरेपन मे पूर्णता
या पूर्णता ही अधूरापन है,
बंधन मे आज़ादी है
या आज़ादी ही बंधन है,
खुशी क्या दीवानगी है
या दीवानगी ही खुशी है,
क्षितिज कपोल कल्पना है
या दूर से दिखने वाला सच