मन करता है खूब पढूं,
सारा कुछ पढ़ जाऊँ,
सारे प्रश्न ख़त्म कर दूँ ,
मन करता है खूब घूमूं,
सारा जहाँ नाप दूँ क़दमों से,
समग्र दृष्टि पा जाऊँ,
मन करता है खूब मिलूं,
सब को हृदयगत कर लूँ,
सारे भेद ख़त्म कर दूँ,
मन करता है खूब हंसूं,
सब कुछ आनंदमय कर दूँ,
सारे दुःख भगा दूँ,
ये सब कर लेने के बाद.......??
मन करता है खूब सोचूं,
सारा कुछ सोच लूँ,
ताकि भावों को जगह दूँ,
लोकेश
Friday, March 6, 2009
Sunday, August 31, 2008
Friday, April 11, 2008
Monday, March 31, 2008
शायद.....
दुनिया की इस भीड़ मे हम क्या दूंदते हैं?
शायद उसे जो इस भीड़ मे नही
अनजानी राहों मे भटकते हम क्या दूंढते हैं ?
शायद कोई भटका हुआ मुसाफिर जो मंजिल तक ले जाए
अनेक किस्से कहानियों मे हम क्या दूंढते हैं?
शायद कोई किरदार हमसे भी ज्यादा असली,
अनगिनत सपनों मे हम क्या दूंढते हैं?
शायद उसे जो न सच हो न सपना बस हो सिर्फ़ अपना
लोक्साद
दुनिया की इस भीड़ मे हम क्या दूंदते हैं?
शायद उसे जो इस भीड़ मे नही
अनजानी राहों मे भटकते हम क्या दूंढते हैं ?
शायद कोई भटका हुआ मुसाफिर जो मंजिल तक ले जाए
अनेक किस्से कहानियों मे हम क्या दूंढते हैं?
शायद कोई किरदार हमसे भी ज्यादा असली,
अनगिनत सपनों मे हम क्या दूंढते हैं?
शायद उसे जो न सच हो न सपना बस हो सिर्फ़ अपना
लोक्साद
Wednesday, March 26, 2008
सच
जीवन मे रस है
या रस मे जीवन है,
अधूरेपन मे पूर्णता
या पूर्णता ही अधूरापन है,
बंधन मे आज़ादी है
या आज़ादी ही बंधन है,
खुशी क्या दीवानगी है
या दीवानगी ही खुशी है,
क्षितिज कपोल कल्पना है
या दूर से दिखने वाला सच
या रस मे जीवन है,
अधूरेपन मे पूर्णता
या पूर्णता ही अधूरापन है,
बंधन मे आज़ादी है
या आज़ादी ही बंधन है,
खुशी क्या दीवानगी है
या दीवानगी ही खुशी है,
क्षितिज कपोल कल्पना है
या दूर से दिखने वाला सच
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