ज़माने के दस्तूर ने,
बहुत बे-आबरू किया,
आज भी फिकरे हैं लेकिन,
गुफ्तगू कुछ और है,
ख्वाहिसों को पाने मे,
हम उम्र गुजार देते ,
छोटी है फेहरिस्त लेकिन,
आरजू कुछ और है,
नाहक ही परेशां थे,
काबिल-ए-हयात होने मे,
सामा तो बहुत है लेकिन,
जुस्तजू कुछ और है,
ज़माने की किस्सागोई,
तमाशों की मोहताज़ है,
किस्सा तो वही है लेकिन,
तवज्जू कुछ और है,
तारीख मे जो लिखा था,
फीका भी न हो सका,
हालात तो वही है लेकिन,
रूबरू कुछ और है,
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