Thursday, April 30, 2009

रात की सुबह

आरजू-ए-गुफ्तगू मे साकी मिले,
हयात-ए-जुस्तजू  से जुदाई लेकर,

शब होती गयी बेसबब बातों मे,
बेइन्तहा सहर की अगुवाई लेकर,
 
ऊम्र भर यूँ कभी तमाशे न हुए,
जज्ब जस्बात की रुसवाई लेकर,

है अब दुनिया से शिकवा न कोई,
 आजाद खयालो की इब्तिदाई  लेकर,

रात  न थी खयालो मे मुक़र्रर जानिब,
सुबह आई है अर्क-ओ-रोशनाई लेकर.

इस दुनिया का क्या होता है "गुलफाम" ?, 
सदा निकली है दिल से आशनाई लेकर,

जुस्तजू = quest, जज्ब =suppressed/hidden, इब्तिदाई = start, मुक़र्रर = fixed/determined, जानिब= side, अर्क=ray , सदा = sound.


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