एक था बच्चा,
अकल का कच्चा,
जाने क्या चाहता था,
बस भागता ही रहता था,
कभी बागों मे,
कभी जंगलों मे,
कभी खेतो मे,
कभी रस्ते पर,
जाने क्या ढूंढ़ता था,
बस पूछता ही रहता था,
कभी पक्षी से,
कभी पेडो से,
कभी नदियों से,
कभी शहरों से,
जाने क्या मांगता था,
बस बोलता ही रहता था,
कभी रोकर,
कभी गाकर,
कभी हंसकर,
कभी हंसाकर,
एक दिन एक तितली उडी,
रंग बिरंगी, बहुत सुन्दर,
बच्चे ने देखा,
और लगा भागने तितली के पीछे,
लगा पूछने उससे,
ओ सुन्दर चंचल तितली
कहा से आती हो और कहा को जाती हो,
क्यों तुम मेरे मन को भाती हो,
बरबस मुझे पास बुलाती हो,
फिर भी मेरे हाथ न आती हो,
तितली ने न कहा न सुना,
बस उड़ती गयी,
जंगलो से खेतो से,
बागो से शहरो से,
रस्तों से गलियों से,
बच्चा जब थक गया पक गया ,
चुपचाप वो बैठ गया,
तितली रानी बड़ी सयानी,
बच्चे के कंधे पर आकर बैठ गयी,
बच्चा बड़ा खुश हुआ,
मेहनत से सन्तुष्ट हुआ.
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