Saturday, April 25, 2009

दास्तान-ए-इश्क

आरजू ए मोहब्बत जरा सी काफी है,
जिन्दा रहने और जीने मे फासले के लिए.

दिल की लगी आँखों से बयां होती है,
है लगी कम या ज्यादा फैसले के लिए,

मोहब्बत का वजूद दिलो मे सुकून से है,
इज़हार-ए-उल्फत है जहां के कायदे के लिए.

दस्तूर-ए-इश्क मे पड़े आशिक जितने,
अकेले ही काफी थे सारे काफिले के लिए.

2 comments:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...
This comment has been removed by a blog administrator.
परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत उम्दा गज़ल है।बधाई स्वीकारें।

दस्तूर-ए-इश्क मे पड़े आशिक जितने,
अकेले ही काफी थे सारे काफिले के लिए.