Monday, April 27, 2009

एक लम्हा

बेखुदी मे इक लम्हा, करता बातें खुद से,
कितने आये और गए लम्हे सारे मुझसे.
खुशगंवार कुछ लम्हे ऐसे, आते जो मुश्किल से,
यूँ आये यूँ चले गए, यादों की महफ़िल से.
बीमार कुछ लम्हे ऐसे, कटते जो बेदिल से,
हार कर मकां से, जाते दूर मंजिल से,
दिलनवाज़ कुछ लम्हे ऐसे, बुनते सपने दिल से,
क्या नया क्या पुराना, गुजर गए गाफिल से  
शर्मसार  कुछ लम्हे ऐसे, खुदी के कातिल से,
कुछ सीखा कुछ भूला, कटते रहे जाहिल से,
ऐसे बहुत से लम्हे,  होते रहे बिस्मिल से,
जो आने और जाने का हो करार आदिल से,
इनमे से मै कौन सा लम्हा पूछता मै हूँ खुद से,
कितने आये और गए लम्हे सारे मुझसे.

गाफिल=irrelevant, बिस्मिल= sacrifice, आदिल=a just man

2 comments:

उम्मीद said...

Bhut hi achchhi rachna


वक्त की धरती पर
लम्हों के निशाँ
कभी नहीं बनते !!
लम्हे तो वैसे ही होते हैं
जैसे समंदर की छाती पर
अलबेली-अलमस्त लहरें
शोर तो बहुत करती आती हैं
मगर अगले ही पल
सब कुछ ख़त्म !!

gargi

Lokesh said...

thanks gargi for your words of praise.